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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 124
एष सर्वाणि भूतानि पञ्चभिर्व्याप्य मूर्तिभिः । जन्मवृद्धिक्षयैर्नित्यं संसारयति चक्रवत्‌ ।।
यह (परमात्मा) सम्पूर्ण प्राणियों में शरीरों को आरम्भ करने वाली पञ्च मूर्तियों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशरूप पञ्चमहाभूतों) से व्याप्त होकर उत्पत्ति, स्थिति और विनाश (क्रमश: जन्म, स्थिति तथा मरण के द्वारा (निरन्तर परिवर्तनशील रथ के) पहिए के समान संसारियों को सर्वदा बनाता रहता है।
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