सुखाभ्युदयिकं चैव नैःश्रेयसिकमेव च ।
प्रवृत्तं च निवृत्तं च द्विविधं कर्मवैदिकम् ।।
वैदिक कर्म दो प्रकार के होते हैं - पहला स्वगादि सुखसाधक संसार में प्रवृत्ति कराने वाला (ज्योतिष्टोमादिरूप) प्रवृत्त कर्म तथा दूसरा निःश्रेयस (मुक्ति) साधक संसार से निवृत्ति कराने वाला (प्रतीकोपासनादिरूप) निवृत्त कर्म।
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