संयोगं पतितैर्गत्वा परस्यैव च योषितम् ।
अपहत्य च विप्रस्वं भवति ब्रह्मराक्षसः ।।
पतितों के साथ संसर्ग (११।१८०) कर, परस्त्री के साथ सम्भोग कर और ब्राह्मण के (सुवर्ण-भिन्न) धन का अपहरण कर मनुष्य ब्रह्मराक्षस होता है।
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