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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 77
सम्भवांश्च वियोनीषु दुः खप्रायासु नित्यशः । शीतातपाभिघातांश्च विविधानि भयानि च ।।
(वे क्षुद्रबुद्धि पापी मनुष्य) अधिक दुःखदायी (तिर्यक्‌ आदि) निषिद्ध योनियों में उत्पत्ति (जन्म) को और शीत तथा आतप (ठंडक तथा धूप) की भयङ्कर विविध पीड़ाओं को प्राप्त करते हैं।
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