यथाचरति धर्म स प्रायशोऽ धर्ममल्पशः ।
तैरेव चावृतो भूतैः स्वर्गे सुखमुपाश्नुते ।।
यदि प्राणी मनुष्य-शरीर में अधिक धर्म तथा थोड़ा पाप करता है तो स्थूल शरीर से परिणत उन्हीं पञ्चमहाभूत (पृथ्वी आदि) से स्वर्ग में सुख को भोगता है।
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