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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 58
तृणगुल्मलतानां च क्रव्यादां दंष्टिणामपि । क्रूरकर्मकृतां चैव शतशो गुरुतल्पगः ।।
गुरुतल्पग (गुरु (२।१४२) की स्त्री के साथ सम्भोग करने वाला) मनुष्य तृण, गुल्म, लता, कच्चे मांस को खाने वाले (गीध आदि) तथा दंष्ट्री (बाघ, सिंह कुत्ता आदि) जीव और क्रूर कर्म करने वाले (बाघ, सिंह या जल्लाद आदि) की योनि को सैकड़ों बार प्राप्त करते हैं।
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