खं सन्निवेशयेत्खेषु चेष्टनस्पर्शनेऽनिलम् ।
पक्तिदृष्ट्योः परं तेजः स्नेहेऽपो गां च मूर्तिषु ।।
(इस समय आगे (१२।१२ १) कहे जाने वाले ब्रह्मध्यान के लिए विशेष उपयोगी होने से दैहिक आकाशादि का ब्राह्म आकाशादि में लय होना कहते हैं-) नासिका उदर आदि सम्बन्धी शारीरिक आकाश में बाह्य आकाश को, चेष्टा तथा स्पर्शरूप शारीरिक वायु में बाह्य वायु को, उदर सम्बन्धि और नेत्र सम्बन्धी शारीरिक तेज में उत्कृष्ट (सूर्य-चन्द्र-सम्बन्धी) बाह्य तेज को, शारीरिक स्नेह (जल) में बाह्य जल को, शारीरिक पार्थिव (पृथ्वी-सम्बन्धी) भागों में बाह्य पृथ्वी को।
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