तौ धर्म पश्यतस्तस्य पापं चातन्द्रितौ सह ।
याभ्यां प्राप्नोति संपृक्तः प्रेत्येह च सुखासुखम् ।।
वे दोनों (महान् तथा परमात्मा) निरालस होकर उस जीव के (भोगने से बचे हुए) धर्म तथा पाप को एक साथ देखते (विचार करते) हैं, जिनसे संयुक्त जीव मर कर परलोक में) तथा इस लोक में (धर्म से) सुख तथा (पाप से) दुःख को पाता है।
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