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मनुस्मृति • अध्याय 12 • श्लोक 5
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसाऽनिष्टचिन्तनम्‌ । वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम्‌ ।।
(१) दूसरे के द्रव्य को अन्याय से भी लेने का विचार करना, (२) मन से निषिद्ध कार्य (ब्रह्महत्यादि पाप कर्म) करने की इच्छा करना, (३) असत्य हठ (परलोक आदि कुछ भी नहीं है, यह देह ही आत्मा है, इत्यादि रूप से दुराग्रह) करना, ये तीन प्रकार के मानसिक (अशुभ) कर्म हैं।
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