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अध्याय 1 — शृंगार शतकम्

शृंगार शतकम्
100 श्लोक • केवल अनुवाद
जिन्होंने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को मृगनयिनी कामिनियों के घर का काम करने के लिए दास बना रखा है, जिनके विचित्र चरित्रों का वर्णन वाणी से नहीं किया जा सकता, उन पुष्पायुध, भगवान् कामदेव को हमारा नमस्कार।
मन्द – मन्द मुस्काना, लजाना, भयभीत होना, मुंह फेर लेना, तिरछी नजर से देखना, मीठी-मीठी बाते करना, ईर्ष्या करना, कलह करना और अनेक तरह के हाव-भाव दिखाना – ये सब स्त्रियों में पुरुषों को बंधन में फंसाने के लिए ही होते हैं, इसमें संदेह नहीं।
चतुराई से भौंहे फेरना, आधी आँख से कटाक्ष करना, मीठी मीठी बातें करना, लज्जा के साथ मुस्कुराना, लीला से मन्द-मन्द चलना और फिर ठहर जाना । ये भाव स्त्रियों के आभूषण और शस्त्र हैं।
कामी पुरुषों को, कभी सुन्दर भौहों से कटाक्ष करने वाली, कभी शर्म से सिर नीचे कर लेने वाली, कभी भय से भीत होने वाली, कभी लीलामय विलास करने वाली, नवीन ब्याही हुई कामिनियों के मुखकमलों की ख़ूबसूरती बढ़ाने वाले नीलकमलों के समान चञ्चल नेत्रों से दसों दिशाएं पूर्ण दिखती हैं।
चन्द्रमा स्वरुप मुख, नेत्र ऐसे की कमल को भी शर्म आ जाये, शारीरिक कान्ति ऐसी जो सोने की दमक से को भी फीका कर दे, भौरों के पुञ्ज को जीतनेवाले केश, गजराज के गण्डस्थली की शोभा का अपमान करने वाले वक्ष, विशाल नितम्ब, मनोहर वाणी और कोमलता – ये सब स्त्रियों के स्वाभाविक भूषण हैं।
उठती जवानी की मृगनयनी सुंदरियों के कौन से काम मनोमुग्धकर नहीं होते? उनका मन्द-मन्द मुस्काना, स्वाभाविक चञ्चल कटाक्ष, नवीन भोग-विलास की उक्ति से रसीली बातें करना और नखरे के साथ मन्द-मन्द चलना – ये सभी हाव-भाव कामियों के मन को शीघ्र वश में कर लेते हैं।
रसियों के देखने योग्य क्या है? मृगनयनी कामिनियों का प्रेमपूर्ण प्रसन्न मुख । सूंघने योग्य क्या है? उनके मुंह की श्वास वायु । सुनने योग्य क्या है? उनकी बातें । सवादिष्ट पदार्थ क्या है? उनके होठों की कलियों का रस । छूने योग्य क्या है? उनका कोमल शरीर । ध्यान करने योग्य क्या है? उनका नवयौवन और विलास। इनकी भ्रमपूर्ण उपस्थिति सर्वत्र है।
चञ्चल कङ्गन, ढीली कौंधनी और पायजेबों के घुंघरुओं की मधुर झनकार से राजहंसों को शर्मानेवाली नवयुवती सुंदरियाँ, भयभीत हिरणी के समान कटाक्ष करके, किसके मन को विवश नहीं कर देती?
जिसकी देह पर केसर लगी है, गोर गोर स्तनों पर हार झूल रहा है और नूपुर रुपी हंस जिसके चरणकमलों में मधुर मधुर शब्द कर रहे हैं – ऐसी सुन्दरी इस पृथ्वी पर किसके मन को वश में नहीं कर लेती?
स्त्रियों को “अबला” कहनेवाले श्रेष्ठ कवियों की बुद्धि निश्चय ही उलटी है । भला, जो अपने नेत्रों के चञ्चल कटाक्षों से महाबली इन्द्रादि देवताओं को भी मार लेती है, वे “अबला” किस तरह हो सकती है।
कामदेव निश्चय ही सुन्दर भौंहवाली स्त्रियों की आज्ञापालन करने वाला चाकर है; क्योंकि जिनपर उनके कटाक्ष पड़ते हैं, उन्ही को वह जा दबाता है।
ऐ कृशांगी! हे नाजनी ! तेरे बाल साफ़ सुथरे और सँवरे हुए हैं, तेरी आँखें बड़ी बड़ी और कानो तक हैं, तेरा मुख स्वभाव से ही स्वच्छ और सफ़ेद दन्तपंक्ति से शोभायमान है, तेरे वक्षों पर मोतियों के हार झूल रहे हैं; पर तेरा ऐसा शीतल और शान्तिमय शरीर भी मेरे मन में तो विकार ही उत्पन्न करता है, यह अचम्भे की बात है!
हे मुग्धे सुन्दरी! धनुर्विद्या में ऐसी असाधारण कुशलता तुझमे कहाँ से आयी, कि बाण छोड़े बिना, केवल गुण से ही तू पुरुष के ह्रदय को बेध देती है?
यद्यपि दीपक, अग्नि, तारे, सूर्या और चन्द्रमा सभी प्रकाशमान पदार्थ मौजूद हैं, पर मुझे एक मृगनयनी सुन्दरी बिना सारा जगत अन्धकार पूर्ण दिखता है।
हे कामिनी ! तेरे गोल गोल उठे हुए भारी वक्ष, चञ्चल नेत्र, चपल भौंह - लता और रागपूर्ण नवीन पत्तों सदृश सुर्ख होंठ – अगर रसियों के शरीर में वेदना करें तो कर सकते हैं, पर यह समझ में नहीं आता कि, कामदेव के निज हाथों से लिखी सौभाग्य की पंक्ति सी – रोमावली – मध्यस्थ होने पर भी क्यों चित्त को सन्तप्त करती है।
वह स्त्री गुरु स्तनभार से, भास्कर के सामान प्रकाशमान मुखचन्द्र से और शनैश्वर के सदृश मन्दगामी दोनों चरणों से ग्रहमयी सी मालूम होती है।
हे चित्त! उस स्त्री के पुष्ट स्तनों, मनोहर जाँघों और सुन्दर मुख को देखकर वृथा क्यों व्याकुल होते हो? यदि तुम उसके कठोर स्तनों कि प्रभृत्ति का आनन्द लेना ही चाहते हो, तो पुण्य करो; क्यूंकि बिना पुण्य किये मनोरथ सिद्ध नहीं होते।
हे योग्य अयोग्य के विचार में निपुण पुरुषों! आप पक्षपात को छोड़, कर्तव्य-कर्म को विचार और शास्त्रों को देखकर यह बात कहिये कि, इस लोक में जन्म लेकर मनुष्य को पर्वतो के नितम्ब सेवन करने चाहिए अथवा कामदेव कि उमन्ग से मन्द-मन्द मुस्कुराती हुई विलासवती तरुणी स्त्रिओं के नितम्ब।
इस संसार में जिसकी अन्तिम अवस्था अतीव चञ्चल है, उन्ही बुद्धिमानो का समय अच्छी तरह कटता है, जिनकी बुध्दि तत्वज्ञान रुपी अमृत सरोवर में बारम्बार गोते लगाने से निर्मल हो गयी है अथवा उन्ही का समय अच्छी तरह अतिवाहित होता है, जो नवयौवनाओं के कठोर और स्थूल कूचों एवं सघन जङ्घाओं को सकाम स्पर्श कर कामदेव का उपभोग करते हैं।
चन्द्रकान्त से मुख, महानील जैसे केश और पद्मराग के समान दोनों हाथों से वह स्त्री रत्नमयी सी मालूम होती है।
चतुर मृगनयनी स्त्रियां पुरुष के ह्रदय में एक बार दया से घुसकर उसे मोहित करतीं, मदोन्मत्त करतीं, तरसातीं, चिढ़ातीं, धमकातीं, रमण करतीं और विरह से दुख देती हैं। ऐसा काम है, जिसे ये मृगलोचनि नहीं करतीं।
वन के वृक्षों की छाया में बारम्बार विश्राम करती हुई, वह विरहिणी स्त्री, अपने कोमल शरीर की रक्षा के लिए, अपना आँचल हाथ में उठा, उससे चन्द्रमा की किरणों को रोकती हुई घूम रही है।
जब तक हम विशाल नयनी कामिनी को नहीं देखते, तब तक तो उसे देखने ही की इच्छा रहती है, दर्शन नसीब हो जाने पर, उसे आलिंगन करने की लालसा बलवती होती है | जब आलिंगन भी हो जाता है, तब तो यह इच्छा होती है कि, यह कामिनी हमारे शरीर से अलग ही न हो – हमारा दोनों का शरीर एक हो जाये।
अधखिले मालती के फूलों की माला गले में पड़ी हो, केसर मिला चन्दन शरीर में लगा होऔर ह्रदयहारिणी प्राणप्यारी छाती से चिपटी हो तो समझ लो, स्वर्ग का शेष सुख यही मिल गया।
पहले पहले तो न न कहती है | इसके बाद थोड़ी थोड़ी अभिलाषा करती है | इसके बाद अंगों को ढीला कर देती है फिर अधीर हो, प्रेम के रस में सराबोर हो जाती है | इसके भी बाद, एकान्त क्रीड़ा की इच्छा करती है और भोग विलास में तरह तरह की चतुराई दिखाती हुई, निःशङ्क होकर मर्दन चुम्बनआदि से असाधारण सुख देती है | ये सब गन कुलबलाओं में ही होते हैं, इसलिए इन कुलकामिनियों के साथ ही रमण करना चाहिए।
आलस्यपूर्ण नेत्रोंवाली स्त्रियों की काम से तृप्ति करना, स्त्री पुरुष दोनों का परस्पर काम्पूजन है, जिसको काम-क्रीड़ा करनेवाले दोनों स्त्री-पुरुष ही जानते हैं।
विधाता ने दो बातें बड़ी अनुचित की हैं – १) पुरुषों में अत्यंत बुढ़ापा होने पर भी काम विकार का होना; २) स्त्रियों का कुच गिर जाने पर भी जीवित रहना और काम चेष्टा करना।
समागम के समय स्त्री पुरुष का एक हो जाना ही काम का फल है। यदि समागम में दोनों का चित्त एक न हो तो वह समागम नहीं; वह तो मृतकों का समागम है।
मृगनयनी कामिनियों के प्रणय प्रीती से मधुर प्रेम रस से पगे, काम की अधिकता से मन्दे, सुनने में आनन्दप्रद, प्रायः अस्पष्ट और समझ में न आने योग्य, सहज सुन्दर, विश्वासयोग्य और कामोद्दीपन करने वाले वचन, यदि स्वछन्दतापूर्वक एकान्त में कहे जाएं तो निश्चय ही सुनने वाले के मन को हर लेते हैं।
या तो पाप ताप नाशिनी गङ्गा के किनारों पर ही रहना चाहिए, या फिर मनोहर हार पहने हुए तरुणी स्त्रियों के कुचो के मध्य में ही रहना चाहिए।
मानिनी कामिनियों के हृदयों में अपने प्यारों के प्रति मान तभी तक ठहरता है जब तक चन्दन के वृक्षों की सुगन्धि से पूर्ण मलयाचल का वायु नहीं चलता।
जब सुगन्धियुक्त पवन चला करती हैं, वृक्षों की शाखाओं में नए नए अङ्कुर निकलते हैं, कोकिला मदमत्त या उत्कण्ठित होकर मधुर कलरव करती है, स्त्रियों के मुखचन्द्र पे मैथुन के परिश्रम से निकले हुए पसीनो के हलकी हलकी धारें मजा देने लगती हैं, उस वसंत की रात में, किसे काम, पीड़ित नहीं करता?
ऋतुराज बसन्त, कोकिल के मधुर मधुर शब्दों और मलय पवन से बिरही स्त्री पुरुषों के प्राण नाश करता है। बड़े ही दुख का विषय है कि प्राणियों के लिए विपदकाल में अमृत भी विष हो जाता है।
भोग विलास से शिथिल होकर अपनी प्यारी के पास आराम करना, कोकीलाओं के मधुर शब्द सुनना, प्रफुल्लित लतामण्डप के नीचे टहलना, सुन्दर कवियों से बातचीत करना और चन्द्रमा के शीतल चांदनी की बहार देखना – ऐसी सामग्री से चैत्र मॉस की विचित्र रात्रियाँ किसी किसी ही भाग्यवान की नेत्र और हृदयों की सुखी करती हैं।
इस बसन्त में जगह जगह बटोहियों को विरह व्याकुल स्त्रियों की विरहाग्नि में आहुति का काम करने वाली आम की मञ्जरियाँ खिल रही हैं । कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाषा या उत्कण्ठा से देख रही है । नए पलाश की फूलों की सुगन्ध को चुरानेवाले और रह की थकन को मिटानेवाली मलय वायु चल रही हैं।
आम की, भौरों की, केसर की गहरी सुगन्ध से दशों दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, मधुर मकरन्द को पी पी कर भौंरे उन्मत्त हो रहे हैं – ऐसे ऋतुराज वसन्त में किसके मन में कामवासना उदय नहीं होता।
अत्यन्त सफ़ेद चन्दन जिनके हाथो में लग रहा है, ऐसी मृगनयनी सुंदरियाँ, फ़व्वारेदार घर, फूल, चाँदनी, मन्दी हवा और महल की साफ़ छत – ये सब गर्मी के मौसम में, मद और मदन, दोनों ही को बढ़ाते हैं।
मनोहर सुगन्धित माला, पंखे की हवा, चन्द्रमा की किरणे, फूलों का पराग, सरोवर, चन्दन की रज, उत्तम मदिरा, महल की उत्तम छत, महीन वस्त्र और कमलनयनी सुंदरी – इन सब उत्तमोत्तम पदार्थों का, गर्मी के तेजी से विकल हुए, कोई कोई भाग्यवान पुरुष ही आनन्द ले सकते हैं।
लिपा पुता साफ़ महल, किरणों वाला चन्द्रमा, प्यारी का मुखकमल, चन्दन की रज और मनोहारी फूलमाला – ये सब चीजें कामी पुरुषों के मन को अत्यन्त क्षोभित करती हैं, परन्तु विषय वासना से विमुख पुरुषों के हृदयों में किसी प्रकार का क्षोभ नहीं करती।
कामदेव का उदय करनेवाली, प्रफुल्लित मालती की लता वाली, उत्तम सुगन्ध धारण करने वाली, उन्नत पीन पयोधरा वर्षा ऋतु, तरुणी स्त्री की तरह किसके मन में हर्ष उत्पन्न नहीं करती?
मेघों आच्छादित आकाश, नवीन नवीन अंकुरों से पूर्ण पृथ्वी, नवीन कुटज और कदम्ब के फूलों से सुगन्धित वायु और मोरों के झुण्ड की मनोहर वाणी से रमणीय वनप्रान्त – वर्षा में सुखी और दुःखी, दोनों तरह को उत्कण्ठित करते हैं।
सिर के ऊपर घनघोर घटाएं छा रही हैं, दाहिने बाएं, दोनों तरफ के पहाड़ों पर मोर नाच रहे हैं; पैरों जमीन नवीन अँकुरों से हरी हो रही है – ऐसे समय में जबकि चारों और कामोद्दीपन करनेवाले सामान नजर आते हैं, विरह-व्याकुल पथिक को कैसे सन्तोष हो सकता है?
एक ओर चपला का चमचम चमकना, दूसरी ओर केतकी के फूलों की मनोहर सुंगन्ध; एक ओर मेघ की गर्जन और दूसरी ओर मोरों का शोर – ये सब जहाँ एकत्र हैं, वहां सुनयनी विरह-व्याकुला स्त्रियां अपने रास पूर्ण विरह के दिनों को कैसे बिताएंगी?
सावन की घोर अँधेरी रात में, जबकि हाथ को हाथ नहीं सूझता, मेघों की भयंकर गर्जना, पत्थर सहित जल की वृष्टि होना और सोने के समान बिजली का चमकना – सुन्दरी सुनयनाओं के लिए, राह में ही, सुख और दुख दोनों का कारण होता है।
वर्षा की झड़ी में प्रियतम घर से बाहर नहीं निकल सकते। जाड़े के मारे विशाल नेत्रों वाली प्राणप्यारी स्त्रियां उनको आलिंगन करती हैं और शीतल जल के कणो सहित वायु, मैथुन के अंत में होने वाले श्रम को मिटा देते हैं – इस तरह वर्ष के दुर्दिन भी भाग्यवानों के लिए सुदिन हो जाते हैं।
आधी रात बीतने पर, जल्दी जल्दी मैथुन करके थक जाने पर और उसी की वजह से असह्य प्यास लगने पर, मदिरा के नशे की हालत में, महल की स्वच्छ छत पर बैठा हुआ पुरुष यदि मैथुन के कारण थकी हुई भुजाओं वाली प्यारी के हाथों से लाई हुई झारी का निर्मल जल, शरद की चांदनी में नही पीता तो वह निश्चय ही अभागा है।
हेमन्त ऋतु में जो दूध, दही और घी खाते हैं; मंजीठ के रंग में रंगे हुए वस्त्र पहनते हैं; शरीर मे केसर का गाढ़ा गाढ़ा लेप करते हैं; आसान-भेद से अनेक प्रकार मैथुन करके सुखी होते हैं; पुष्ट जांघो और सघन कठोर कुचों वाली स्त्रियों का गाढ़ आलिंगन करते हैं और मसालेदार पान का बीड़ा चबाते हुए मकान के भीतरी कमरे में सुख से सोते हैं, वे निश्चय ही भाग्यवान हैं।
स्त्रियों के केशयुक्त बालों को चूमता हुआ, जोर के जाड़े के मारे उनके मुँह से “सी-सी” करता हुआ, आंगी रहित खुले हुए कुचों को रोमांचित करता हुआ, पेडुओं को कम्पाता हुआ और पुष्ट जांघो से कपडा हटाता हुआ, शिशिर का जार पुरुषों का सा आचरण करता हुआ बह रहा है।
बालों को बिखेरता, आँखों को कुछ कुछ मूँदता, साड़ी को जोर से उडाता, देह को रोमांचित करता, शरीर में सनसनी पैदा करता, कांपते हुए शरीर को आलिंगन करता, बारंबार सी सी कराकर होठों को चूमता हुआ, शिशिर का वायु, पतियों का सा आचरण करता है।
"सांसारिक विषय भोग असार, विरति में विघ्न करने वाले और सब दोषों की खान है" – इत्यादि निन्दा लोग भले ही करें फिर भी इनकी महिमा अपार है और इनके शक्तिशाली होने में कोई संदेह नहीं क्योंकि ब्रह्मविचार में लीं तत्ववेत्ताओं के ह्रदय में भी ये प्रकाशित होते हैं।
आप वेदान्तवेत्ताओं के माननीय गुरु हो और हम उत्तम काव्य रचयिता कवियों के सेवक हैं; तो भी हमें यह बात कहनी ही पड़ती है कि परोपकार से बढ़कर पुण्य नहीं है और कमलनयनी सुन्दर स्त्रियों से बढ़कर सुन्दर पदार्थ नहीं है।
युक्तिशून्य वृथा प्रलाप से क्या प्रयोजन? इस जगत में दो ही वस्तुएं सेवन करने योग्य हैं – (१) नवीन मदान्ध लीलाभिलाषिणी और स्तनभार से खिन्न सुंदरियों का यौवन अथवा (२) वन।
शास्त्रवक्ता पण्डितों का स्त्री-त्याग का उपदेश केवल कथनमात्र ही है। लाल रत्न-जड़ित करधनीवाली कमलनयनी स्त्रियों की मनोहर जंघाओं को कौन त्याग सकता है।
जो विद्वान् युवतियों की निंदा करता है, वह निश्चय ही झूठा पण्डित है। उसने पहले आप धोखा खाया है, अब दूसरों को धोखा देता है, क्योंकि अनेक प्रकार की तपस्याओं का फल स्वर्ग है और स्वर्ग का फल अप्सरा भोग है।
इस पृथ्वी पर मतवाले हाथी का मस्तक विदारनेवाले शूर अनेक हैं, प्रचण्ड मृगराज – सिंह के मारनेवाले भी कितने ही मिल सकते हैं परंतु बलवानों के सामने हम हठ करके कहते हैं कि कामदेव के मद को मर्दन को करने वाले पुरुष विरले ही होंगे।
पुरुष सत्मार्ग में तभी तक रह सकता है, इन्द्रियों को तभी तक वश में रख सकता है, लज्जा को उसी समय तक धारण कर सकता है, नम्रता का अवलम्बन तभी तक कर सकता है, जब तक कि लीलावती स्त्रियों के भौंह रुपी धनुष से कानों तक खींचे गए, श्याम वरौनि रुपी पङ्ख धारण किये, धीरज को छुड़ाने वाले नयन रुपी बाण ह्रदय में नहीं लगते।
बड़ाई, पण्डिताई, कुलीनता और विवेक – मनुष्य के ह्रदय में तभी तक रह सकते हैं, जब तक शरीर में कामाग्नि प्रज्वलित नहीं होती।
शास्त्रज्ञ, विनयी और आत्मज्ञानियों में कोई विरला ही ऐसा होगा, जो सद्गति का पात्र हो; क्योंकि यहाँ वामलोचना स्त्रियों की बाँकी भ्रू-लता-रुपी कुञ्जी उनके लिए नरकद्वार का ताला खोले रहती है।
काना, लंगड़ा, कनकटा और दुमकटा कुत्ता, जिसके शरीर में अनेक घाव हो रहे हैं, उनसे पीब और राध झरते हैं, दुर्गन्ध का ठिकाना नहीं है, घावों में हजारों कीड़े पड़े हैं, जो भूख से व्याकुल हो रहा है और जिसके गले में हांडी का घेरा पड़ा हुआ है, कामांध होकर कुतिया के पीछे पीछे दौड़ता है। है! कामदेव बड़ा ही निर्दयी है, जो मरे को भी मारता है।
जो मूर्ख सब अर्थ और सम्पदों की देने वाली, कामदेव की मुद्रा रुपी स्त्रियों को त्यागकर, स्वर्ग प्रभृति की इच्छा से, घर छोड़ कर निकल गए हैं, उन्हें विरक्त भेष में न समझना चाहिए। उन्हें कामदेव ने अनेक प्रकार के कठोर दण्ड दिए हैं। इसी से कोई नंगा फिरता है, कोई सर मुंडाए घूमता है, किसी ने पञ्चकेशी रखाई है, किसी ने जटा रखाई है और कोई हाथ में ठीकरा लेकर भीख मांगता फिरता है।
विश्वामित्र, पराशर, मरीचि और शृंगि प्रभृति बड़े बड़े विद्वान ऋषि मुनि, जो वायु जल और पत्ते खाकर गुजरा करते थे, स्त्री के मुख-कमल को देखकर मोहित हो गए; तब जो मनुष्य अन्न,घी, दूध, दही प्रभृति नाना प्रकार के व्यञ्जन खाते और पीते हैं, कैसे अपनी इन्द्रियों वश में रख सकते हैं? यदि वे अपनी इन्द्रियों को वश कर सकें, तो विंध्याचल पर्वत भी समुद्र में तैर सके।
अगर इस संसार में, पूर्ण चन्द्रमा की सी कांती वाली, कमल की सी आँखोंवाली, कमर में लटकती हुई करधनी पहनने वाली, स्तंभार से झुकी हुई कमर वाली युवती स्त्रियां न होती, तो निर्मल बुद्धि मनुष्य, राजाओं के द्वार की सेवाओं में, अनेक कष्ट उठाकर अधीर चित्त क्यों होते?
यदि त्रस्ता मृगशावकनयनी कामास्त्ररूपा कामिनी इस जगत में न होती तो सिद्ध – महात्माओं की गुफाएं, महादेव के वाहन – नन्दीश्वर, बैल के कन्धा रगड़ने के वृक्ष और गङ्गाजल से पवित्र हुई शिलाओं वाले हिमालय के स्थान को छोड़ कौन मनस्वी – बुद्धिमान पुरुष लोगो के सामने जा, माथा झुका, उन्हें प्रणाम करके अपने मान को मलीन करता?
हे संसार! यदि तुझमें मद से मतवाले नेत्रों वाली दुस्तर स्त्रियां नहीं होती, तो तेरे परली पर जाना कुछ कठिन न होता।
हे महाराज! इस तृष्णा रूपी समुद्र के पार कोई न जा सका। अतीव प्यारी यौवनावस्था चले जाने पर, अधिक धन सञ्चय से क्या लाभ होगा? हम शीघ्र ही अपने घर क्यों न चले जाएं, क्योंकि, कहीं ऐसा न हो, विकसित कुमुद और कमल के समान नेत्रोंवाली हमारी प्यारियों के रूप को वृद्धावस्था घुला घुलकर बिगाड़ डाले।
अनुराग के घर, नरक के नाना प्रकार के दुखों हेतु, मोह की उत्पत्ति के बीज, ज्ञानरुपी चन्द्रमा के ढकने को मेघ समूह, कामदेव के मुख्य मित्र, नाना दोषों को स्पष्ट प्रकटाने वाले और अपने कुल को दहन करनेवाले यौवन के सिवा, इस लोक में दूसरा कोई अनर्थ नहीं है।
अहो! मोह की कैसी विचित्र महिमा है कि , बड़े बड़े विद्वान् पण्डित भी प्रत्यक्ष ही अपवित्रता की पुतली – स्त्री को देखकर मोहित हो हैं, उसकी स्तुति करते हैं, आनंदित होते हैं, रमन करते हैं और उत्कण्ठित होकर हे कमलनयनी! हे विशाल नितम्बों वाली ! हे विशालाक्षी! हे कल्याणी! हे शुभे! हे पुष्टपयोधरवाली! हे सुन्दर भौंहोंवाली प्रभृति नाना प्रकार के सम्बोधनों से उसे सम्बोधित करते हैं।
जो स्त्री स्मरणमात्र करने से सन्ताप कराती है, देखते ही उन्माद बढाती है और छूते ही मोह उत्पन्न करती है, उसे न जाने क्यों प्राण-प्यारी कहते हैं?
स्त्री जब तक आँखों के सामने रहती है, तब तक अमृत सी मालूम होती है परन्तु आँखों की ओट होते ही, विष से भी अधिक दुखदायिनी हो जाती है।
सुंदरी नितम्बिनी को छोड़कर न और अमृत है और न विष। स्त्री अगर अपने प्यारे को चाहे तो अमृत लता है और जब वह उसे न चाहे तो निश्चय ही विष की मञ्जरी है।
संदेहों का भंवर, अविनय का घर, साहसों का नगर, पाप दोषों का खजाना, सैकड़ों तरह के कपट और अविश्वास का क्षेत्र, स्वर्ग-द्वार का विघ्न, नरक नगर का द्वार, साड़ी मायाओं का पिटारा, अमृत रूप में विष और पुरुषों को मोह जाल में फ़साने वाला स्त्री-यंत्र न जाने किसने बनाया?
अगर हमसे पक्षपात रहित सच्ची बात पूछी जाय, तो हमको कहना होगा कि चन्द्रमा स्त्री का मुख नहीं, कमल उसके नेत्र नहीं; उसका भी शरीर और सब प्राणियों की तरह हाड़, काम और मांस का है। इस बात को जानकर भी, कवियों की मिथ्या उक्तियों के भुलावे में पड़कर, हमलोग स्त्रियों पर आसक्त रहते हैं और उन्हें सेवन करते हैं।
जिस तरह मूर्ख भौरा कमलिनी की स्वाभाविक ललाई को देखकर उसपर मुग्ध हो जाता है और उसके चारों ओर गूंजता फिरता है; उसी तरह मूढ़ पुरुष लीलावती स्त्रियों के स्वाभाविक हाव्-भाव और नाज-नखरों को देखकर उनपर मुग्ध हो जाते हैं।
स्त्री का पूर्णिमा के चन्द्रमा की छवि को हरने वाला कमलमुख, जिसमें अधरामृत रहता है, मन्दार के फल की तरह अज्ञात या यौवनावस्था तक ही अच्छा मालूम होता है; समय बीतने यानि बुढ़ापा आने पर वही कमल मुख अनार के पके और सड़े फल की तरह विष सा हो जाता है।
रूप ही जल है, चञ्चल नयन मछलियां हैं, नाभि भंवर है और सर के बाल सर्प हैं – यह तरुण स्त्री रुपी नदी, दुस्तर नदी है। इस नदी में श्रृंगार-शास्त्र प्रवीण सज्जन स्नान करते हैं।
स्त्रियां बात तो किसी से करती हैं, देखतीं किसी और को हैं, दिल में चाहती किसी और को हैं। विलासवती स्त्रियों का प्यारा कौन है?
स्त्रियों की बातों में अमृत और ह्रदय में हलाहल विष होता है; इसीलिए पुरुष उनका अधरामृत पान और उनकी छातियों का मर्दन करते हैं।
हे मित्र! सहज ही क्रूर, विलास रुपी फण वाले और कटाक्ष रुपी विषाग्नि धारण करने वाले स्त्री-रुपी सर्प से दूर भाग; क्योंकि और सर्पों का काटा हुआ तो मन्त्र और औषधियों से अच्छा हो सकता है; पर चतुर स्त्री रुपी सर्प के डसे हुए को झाड़-फूंक वाले गारुड़ी भी छोड़ भागते हैं।
इस संसार रुपी समुद्र में कामदेव रुपी धीमर ने स्त्री रुपी जाल फैला रखा है। इस जाल में वह अधरमिष-लोभी पुरुष-रुपी मछलियों को, शीघ्रता से, खींच खींच कर, अनुराग-रुपी अग्नि में पकता है।
हे मन-रुपी पथिक! कुच रुपी पर्वतों में होकर, दुर्गम कामिनी के शरीर रुपी वन में न जाना, क्योंकि वहां कामदेव-रुपी तस्कर रहता है।
बड़े लम्बे, तेज चलने वाले, टेढ़ी चालवाले, भयंकर फनधारी काले से काटा जाना भला; पर अत्यन्त विशाल, चञ्चल, टेढ़ी चालवाले, तेजस्वी और नीलकमल की कान्तिवाले कामिनी के नेत्रों से डसा जाना भला नहीं; क्योंकि सर्प के काटे हुए को बचाने वाले धर्मार्थी मनुष्य सर्वत्र मिलते हैं; पर सुनयना की दृष्टि से काटे हुए की न कोई दवा है न वैद्य।
यह कैसा मधुर गाना है, यह कैसा उत्तम नाच है, इस पदार्थ का स्वाद कैसा अच्छा है, यह सुगन्ध कैसी मनोहर है, इन स्तनों को छूने से कैसा मजा आता है! हे मनुष्य! तू इन पांच विषयों में भ्रमता हु – परमार्थ नाशिनी नरकादि की साधनभूत पांचों इन्द्रियों से ठगा गया है।
जब कामदेव रुपी अकस्मार – मृगी- रोग का, भ्रम के आवेश से दौरा होता है, तब शरीर में असह्य वेदना होती है, शरीर दुखता है, मन घूमता है और आँखें चक्कर खाती हैं। यह रोग मन्त्र, औषधि, नाना प्रकार के शान्ति कर्म और पूजा पाठ, किसी से भी नाश नहीं होता।
कुरूप, बुढ़ापे से शिथिल, गंवार, नीच और गलित कुष्ठी को, थोड़े से धन की आशा से, जो अपना सुन्दर शरीर सौंप देती है और जो विवेक रुपी कल्पलता के लिए छुरी के सामान है, उस वैश्या से कौन विद्वान् रमण करना चाहेगा?
यह वैश्य सुंदरता रुपी इन्धन से जलती हुई प्रचंड कामाग्नि है। कामी पुरुष इस अग्नि में अपने यौवन और धन की आहुति देते हैं।
वैश्य का अधर-पल्लव (ओंठ) यद्यपि अतीव मनोहर है; किन्तु वह जासूस, सिपाही, चोर, नट, दास, नीच और जारों के थूकने का ठीकरा है । इसलिए कौन कुलीन पुरुष उसे चूमना चाहेगा।
चञ्चल और बड़ी बड़ी आँखों वाली, यौवन के अभिमान से पूर्ण, दृढ़ और पुष्ट स्तनों वाली अवं क्षीण उदरभाग पर त्रिवली से सुशोभित युवती स्त्रियों की सूरत देखकर, जिन पुरुषों के मन में विकार उत्पन्न नहीं होता, वे पुरुष धन्य हैं।
हे बाले! लीला से जरा जरा खुले हुए नेत्रों से सुन्दर कटाक्ष हम पर क्यों फेंकती है? विश्राम ले! विश्राम ले! हमारे लिए तेरा यह श्रम व्यर्थ है। क्योंकि अब हम पहले जैसे नहीं रहे; अब हमारा छछोरपन चला गया, अज्ञान दूर हो गया। हम बन में रहते हैं और जगज्जाल को तिनके के सामान समझते हैं।
इस बाला का क्या मतलब है, जो यह अपने कमल-दल की शोभा को तिरस्कार करने वाले नेत्रों को मेरी ओर चलाती है? मेरा अज्ञान नाश हो गया और कामदेव रुपी भील के बाणों से उत्पन्न हुई अग्नि भी शान्त हो गई, तथापि यह मूर्ख बाला विश्राम नहीं लेती!
जब तक मनुष्य के पूर्वजन्म के शुभ कर्मों का प्रभाव रहता है, तब तक उज्जवल भवन, हाव्-भाव युक्त सुंदरी नारियां और सफ़ेद छत्र चँवर प्रभृति से शोभायमान लक्ष्मी – ये सब स्थिर भाव से भोगने में आते हैं; किन्तु पूर्वजन्म के पुण्यों का क्षय होते ही, ये सब सुखैश्वर्य के समान – कामदेव की क्रीड़ा के कलह में टूटे हुए हार के मोतियों के समान – शीघ्र ही जहाँ तहाँ लुप्त हो जाते हैं ।
जो अपने मन को वश में करके, आत्मा को सदा योगाभ्यास-साधन में लगाए रहना ही पसन्द करते हैं – उन्हें प्यारी प्यारी स्त्रियों की बातचीत, अधरामृत, श्वासों की सुगन्धि सहित मुखचन्द्र और कुचकलशों को ह्रदय से लगाकर काम-क्रीड़ा से क्या मतलब?
अजितेन्द्रिय मनुष्यों से सम्बन्ध रखनेवाला, चित्त की एकाग्रता या समाधि में अतीव चञ्चलता करनेवाला, सर्प के समान कुटिल और स्तब्ध स्त्रियों का भ्रूक्षेप या कटाक्ष खल के समान आचरण करता है।
जो पुरुष मैथुन के श्रम से थक कर, मतवाले हाथी के कुम्भों के समान वितीर्ण और केशर से भीगे हुए स्त्री के स्तनों पर अपनी छाती रखकर, उसके भुजा रुपी पञ्जर के बीच में पड़ा हुआ, एक क्षण भी सोकर रात बीतता है, वह धन्य है।
हे प्यारी! ये चन्द्रमा अमृतमय, अतएव काम चैतन्य करने वाला होने पर भी, अपने क्षय रोग की शान्ति के लिए, नाक के अगले हिस्से में लटकते हुए मोती के मिससे, तेरे अधरामृत को पी रहा है।
हे पुरुषों! या तो तुम वन-मृगियों के लिए बांस के दण्डे के समान छविवाली, पत्थर की नोक से कटी हुई मूलवाली, कुश नाम का घास के ग्रास दो अथवा सुन्दरी बहुओं के लिए लाल लाल नाखूनों से तोड़े हुए सुई – तोती के कपोल के समान, जरा जरा पीले रंग के पान दो।
जब तक मुझमें काम का अज्ञान-अन्धकार था, तब तक मुझे सारा संसार स्त्रीमय दीखता था।
लेकिन अब मैंने आँखों में विवेक-अञ्जन लगाया है, इसलिए मेरी समदृष्टि हो गयी है, मुझे त्रिलोकी ब्रह्ममय दीखती है।
कोई वैराग्य को पसंद करता है, कोई नीति में मस्त रहता है और कोई श्रृंगार में मग्न रहता है। इस भूतल पर, मनुष्यों में परस्पर इच्छाओं का भेदाभेद है।
जिसकी जिस चीज़ में रूचि नहीं होती, वह चाहे जैसी सुन्दर क्यों न हो, उसे वह अच्छी नहीं लगती। चन्द्रमा सुन्दर है, परन्तु कमलिनी उसे नहीं चाहती।
इतना ही है शृंगार शतकम्।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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