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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 46
स्रग्धराअर्धं नीत्वा निशायाः सरभससुरतायासखिन्नश्लथाङ्गःप्रोद्भूतासह्यतृष्णो मधुमदनिरतो हर्म्यपृष्ठे विविक्ते ॥ सम्भोगाक्लान्तकान्ताशिथिलभुजलताऽऽवर्जितं कर्करीतोज्योत्स्नाभिन्नाच्छधारं न पिबति सलिलं शारदं मंदभाग्यः ॥
आधी रात बीतने पर, जल्दी जल्दी मैथुन करके थक जाने पर और उसी की वजह से असह्य प्यास लगने पर, मदिरा के नशे की हालत में, महल की स्वच्छ छत पर बैठा हुआ पुरुष यदि मैथुन के कारण थकी हुई भुजाओं वाली प्यारी के हाथों से लाई हुई झारी का निर्मल जल, शरद की चांदनी में नही पीता तो वह निश्चय ही अभागा है।
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