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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 25
शार्दूलविक्रीडितप्राङ्मामेति मनागमानितगुणं जाताभिलाषां ततःसव्रीडं तदनु श्लथीकृततनु प्रध्वस्तधैर्यं पुनः ॥ प्रेमार्द्रं स्पृहणीयनिर्भररहःक्रीडाप्रगल्भं ततोनिःशङ्काङ्गविकर्षणाधिकसुखं रम्यं कुलस्त्रीरतम् ॥
पहले पहले तो न न कहती है | इसके बाद थोड़ी थोड़ी अभिलाषा करती है | इसके बाद अंगों को ढीला कर देती है फिर अधीर हो, प्रेम के रस में सराबोर हो जाती है | इसके भी बाद, एकान्त क्रीड़ा की इच्छा करती है और भोग विलास में तरह तरह की चतुराई दिखाती हुई, निःशङ्क होकर मर्दन चुम्बनआदि से असाधारण सुख देती है | ये सब गन कुलबलाओं में ही होते हैं, इसलिए इन कुलकामिनियों के साथ ही रमण करना चाहिए।
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