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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 93
वसंततिलका मत्तेभकुम्भपरिणाहिनि कुङ्कुमार्द्रे कान्तापयोधरतटे रसखेदखिन्नः ॥ वक्षो निधाय भुजपञ्जरमध्यवर्ती धन्यः क्षपां क्षपयति क्षणलब्धनिद्रः ॥
जो पुरुष मैथुन के श्रम से थक कर, मतवाले हाथी के कुम्भों के समान वितीर्ण और केशर से भीगे हुए स्त्री के स्तनों पर अपनी छाती रखकर, उसके भुजा रुपी पञ्जर के बीच में पड़ा हुआ, एक क्षण भी सोकर रात बीतता है, वह धन्य है।
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