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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 23
उपजातिअदर्शने दर्शनमात्रकामा दृष्ट्वा परिष्वङ्गसुखैकलोलाः ॥ आलिङ्गितायां पुनरायताक्ष्यां आशास्महे विग्रहयोरभेदम् ॥
जब तक हम विशाल नयनी कामिनी को नहीं देखते, तब तक तो उसे देखने ही की इच्छा रहती है, दर्शन नसीब हो जाने पर, उसे आलिंगन करने की लालसा बलवती होती है | जब आलिंगन भी हो जाता है, तब तो यह इच्छा होती है कि, यह कामिनी हमारे शरीर से अलग ही न हो – हमारा दोनों का शरीर एक हो जाये।
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