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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 65
स्रग्धराराजंस्तृष्णाम्बुराशेर्न हि जगति गतः कश्चिदेवावसानंको वार्थोऽर्थै प्रभूतैः स्ववपुषि गलिते यौवने सानुरागे ॥ गच्छामः सद्म तावद्विकसितकुमुदेन्दीवरालोकिनीनांयावच्चाक्रम्य रूपं झटिनि न जरया लुप्यते प्रेयसीनाम् ॥
हे महाराज! इस तृष्णा रूपी समुद्र के पार कोई न जा सका। अतीव प्यारी यौवनावस्था चले जाने पर, अधिक धन सञ्चय से क्या लाभ होगा? हम शीघ्र ही अपने घर क्यों न चले जाएं, क्योंकि, कहीं ऐसा न हो, विकसित कुमुद और कमल के समान नेत्रोंवाली हमारी प्यारियों के रूप को वृद्धावस्था घुला घुलकर बिगाड़ डाले।
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