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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 67
शार्दूलविक्रीडितकान्तेत्युत्पललोचनेति विपुलश्रोणीभरेत्युत्सुकःपीनोत्तुङ्गपयोधरेति सुमुखाम्भोजेति सुभ्रूरिति ॥ दृष्ट्वा माद्यति मोदतेऽभिरमते प्रस्तौति विद्वानपिप्रत्यक्षाशुचिभस्त्रिकां स्त्रियमहो मोहस्य दुश्चेष्टितम् ॥
अहो! मोह की कैसी विचित्र महिमा है कि , बड़े बड़े विद्वान् पण्डित भी प्रत्यक्ष ही अपवित्रता की पुतली – स्त्री को देखकर मोहित हो हैं, उसकी स्तुति करते हैं, आनंदित होते हैं, रमन करते हैं और उत्कण्ठित होकर हे कमलनयनी! हे विशाल नितम्बों वाली ! हे विशालाक्षी! हे कल्याणी! हे शुभे! हे पुष्टपयोधरवाली! हे सुन्दर भौंहोंवाली प्रभृति नाना प्रकार के सम्बोधनों से उसे सम्बोधित करते हैं।
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