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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 79
वसंततिलकाविस्तारितं मकरकेतनधीवरेणस्त्रीसंज्ञितं बडिशमत्र भवाम्बुराशौ ॥ येनाचिरात्तदधरामिषलोलमर्त्य-मत्स्याद्विकृष्य स पचत्यनुरागवह्नौ ॥
इस संसार रुपी समुद्र में कामदेव रुपी धीमर ने स्त्री रुपी जाल फैला रखा है। इस जाल में वह अधरमिष-लोभी पुरुष-रुपी मछलियों को, शीघ्रता से, खींच खींच कर, अनुराग-रुपी अग्नि में पकता है।
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