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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 38
शिखरिणीस्रजो हृद्यामोदा व्यजनपवनश्चन्द्रकिरणाःपरागः कासारो मलयजरसः सीधु विशदम् ॥ शुचिः सौधोत्सङ्गः प्रतनु वसनं पङ्कजदृशोनिदाधार्ता ह्येतत्सुखमुपलभन्ते सुकृतिनः ॥
मनोहर सुगन्धित माला, पंखे की हवा, चन्द्रमा की किरणे, फूलों का पराग, सरोवर, चन्दन की रज, उत्तम मदिरा, महल की उत्तम छत, महीन वस्त्र और कमलनयनी सुंदरी – इन सब उत्तमोत्तम पदार्थों का, गर्मी के तेजी से विकल हुए, कोई कोई भाग्यवान पुरुष ही आनन्द ले सकते हैं।
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