मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 63
शार्दूलविक्रीडितसिद्धाध्यासितकन्दरे हरवृषस्कन्धावरुग्णद्रुमेगङ्गाधौतशिलातले हिमवतः स्थाने स्थिते श्रेयसि ॥ कः कुर्वीत शिरः प्रमाणमलिनं म्लानं मनस्वी जनोयद्वित्रस्तरकुरङ्गशावनयना न स्युः स्मरास्त्रं स्त्रियः ॥
यदि त्रस्ता मृगशावकनयनी कामास्त्ररूपा कामिनी इस जगत में न होती तो सिद्ध – महात्माओं की गुफाएं, महादेव के वाहन – नन्दीश्वर, बैल के कन्धा रगड़ने के वृक्ष और गङ्गाजल से पवित्र हुई शिलाओं वाले हिमालय के स्थान को छोड़ कौन मनस्वी – बुद्धिमान पुरुष लोगो के सामने जा, माथा झुका, उन्हें प्रणाम करके अपने मान को मलीन करता?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शृंगार शतकम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शृंगार शतकम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें