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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 50
शिखरिणीअसाराः सन्त्वेते विरसविरसाश्चैव विषयाजुगुप्सन्तां यद्वा ननु सकलदोषास्पदमिति ॥ तथाप्यन्तस्तत्त्वे प्रणिहितधियामप्यनबलःतदीयो नाख्येयः स्फुरति हृदये कोऽपि महिमा ॥
"सांसारिक विषय भोग असार, विरति में विघ्न करने वाले और सब दोषों की खान है" – इत्यादि निन्दा लोग भले ही करें फिर भी इनकी महिमा अपार है और इनके शक्तिशाली होने में कोई संदेह नहीं क्योंकि ब्रह्मविचार में लीं तत्ववेत्ताओं के ह्रदय में भी ये प्रकाशित होते हैं।
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