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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 86
आर्याकश्चुम्बति कुलपुरुषो वेश्याधरपल्लवं मनोज्ञमपि । चारभटचौरचेटकनटविटनिष्ठीवनशरावम्॥
वैश्य का अधर-पल्लव (ओंठ) यद्यपि अतीव मनोहर है; किन्तु वह जासूस, सिपाही, चोर, नट, दास, नीच और जारों के थूकने का ठीकरा है । इसलिए कौन कुलीन पुरुष उसे चूमना चाहेगा।
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