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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 54
आर्यास्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतिम् । यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः ॥
जो विद्वान् युवतियों की निंदा करता है, वह निश्चय ही झूठा पण्डित है। उसने पहले आप धोखा खाया है, अब दूसरों को धोखा देता है, क्योंकि अनेक प्रकार की तपस्याओं का फल स्वर्ग है और स्वर्ग का फल अप्सरा भोग है।
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