मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 66
स्रग्धरारागस्यागारमेकं नरकशतमहादुःखसम्प्राप्तिहेतुःमोहस्योत्पत्तिबीजं जलधरपटलं ज्ञानताराधिपस्य ॥ कन्दर्पस्यैकमित्रं प्रकटितविविधस्पष्टदोषप्रबन्धंलोकेऽस्मिन्न ह्यनर्थव्रजकुलभवनं यौवनादन्यदस्ति ॥
अनुराग के घर, नरक के नाना प्रकार के दुखों हेतु, मोह की उत्पत्ति के बीज, ज्ञानरुपी चन्द्रमा के ढकने को मेघ समूह, कामदेव के मुख्य मित्र, नाना दोषों को स्पष्ट प्रकटाने वाले और अपने कुल को दहन करनेवाले यौवन के सिवा, इस लोक में दूसरा कोई अनर्थ नहीं है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
शृंगार शतकम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

शृंगार शतकम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें