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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 24
रथोद्धतामालती शिरसि जृम्भणोन्मुखीचन्दनं वपुषि कुङ्कुमान्वितम् ॥ वक्षसि प्रियतमा मनोहरास्वर्ग एव परिशिष्ट आगतः ॥
अधखिले मालती के फूलों की माला गले में पड़ी हो, केसर मिला चन्दन शरीर में लगा होऔर ह्रदयहारिणी प्राणप्यारी छाती से चिपटी हो तो समझ लो, स्वर्ग का शेष सुख यही मिल गया।
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