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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 2
छन्द – वंशस्थ स्मितेन भावेन च लज्जया भिया पराङ्मुखैरर्द्धकटाक्षवीक्षणैः ॥ वचोभिरीर्ष्याकलहेन लीलया समस्तभावैः खलु बन्धनं स्त्रियः ॥
मन्द – मन्द मुस्काना, लजाना, भयभीत होना, मुंह फेर लेना, तिरछी नजर से देखना, मीठी-मीठी बाते करना, ईर्ष्या करना, कलह करना और अनेक तरह के हाव-भाव दिखाना – ये सब स्त्रियों में पुरुषों को बंधन में फंसाने के लिए ही होते हैं, इसमें संदेह नहीं।
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