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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 13
अनुष्टुभ्मुग्धे! धानुष्कता केयमपूर्वा त्वयि दृश्यते । यया विध्यसि चेतांसि गुणैरेव न सायकैः ॥
हे मुग्धे सुन्दरी! धनुर्विद्या में ऐसी असाधारण कुशलता तुझमे कहाँ से आयी, कि बाण छोड़े बिना, केवल गुण से ही तू पुरुष के ह्रदय को बेध देती है?
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