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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 84
शार्दूलविक्रीडितजान्त्यन्धाय च दुर्मुखाय च जराजीर्णाखिलाङ्गाय चग्रामीणाय च दुष्कुलाय च गलत्कुष्ठाभिभूताय च ॥ यच्छन्तीषु मनोहरं निजवपुर्लक्ष्मीलवाकाङ्क्षयापण्यस्त्रीषु विवेककल्पलतिकाशस्त्रीषु रज्येत कः॥
कुरूप, बुढ़ापे से शिथिल, गंवार, नीच और गलित कुष्ठी को, थोड़े से धन की आशा से, जो अपना सुन्दर शरीर सौंप देती है और जो विवेक रुपी कल्पलता के लिए छुरी के सामान है, उस वैश्या से कौन विद्वान् रमण करना चाहेगा?
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