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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 62
स्रग्धरासंसारेऽस्मिन्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानांतत्त्वज्ञानामृताम्भःप्लवलुलितधियां यातु कालः कथञ्चित् ॥ नोचेन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजघनभराभोगसम्भोगिनीनांस्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलोलोद्यतानाम् ॥
अगर इस संसार में, पूर्ण चन्द्रमा की सी कांती वाली, कमल की सी आँखोंवाली, कमर में लटकती हुई करधनी पहनने वाली, स्तंभार से झुकी हुई कमर वाली युवती स्त्रियां न होती, तो निर्मल बुद्धि मनुष्य, राजाओं के द्वार की सेवाओं में, अनेक कष्ट उठाकर अधीर चित्त क्यों होते?
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