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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 70
नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्त्वा नितम्बिनीम् । सैवामृतरुता रक्ता विरक्ता विषवल्लरी ॥
सुंदरी नितम्बिनी को छोड़कर न और अमृत है और न विष। स्त्री अगर अपने प्यारे को चाहे तो अमृत लता है और जब वह उसे न चाहे तो निश्चय ही विष की मञ्जरी है।
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