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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 80
अनुष्टुभ्कामिनीकायकान्तारे स्तनपर्वतदुर्गमे । मा सञ्चर मनःपान्थ ! तत्रास्ते स्मरतस्करः ॥
हे मन-रुपी पथिक! कुच रुपी पर्वतों में होकर, दुर्गम कामिनी के शरीर रुपी वन में न जाना, क्योंकि वहां कामदेव-रुपी तस्कर रहता है।
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