हे कामिनी ! तेरे गोल गोल उठे हुए भारी वक्ष, चञ्चल नेत्र, चपल भौंह - लता और रागपूर्ण नवीन पत्तों सदृश सुर्ख होंठ – अगर रसियों के शरीर में वेदना करें तो कर सकते हैं, पर यह समझ में नहीं आता कि, कामदेव के निज हाथों से लिखी सौभाग्य की पंक्ति सी – रोमावली – मध्यस्थ होने पर भी क्यों चित्त को सन्तप्त करती है।
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