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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 15
शार्दूलविक्रीडितउद्वृत्तः स्तनभार एष तरले नेत्रे चले भ्रूलतेरागाधिष्ठितमोष्ठपल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम् ॥ सौभाग्याक्षरमालिकेव लिखिता पुष्पायुधेन स्वयंमध्यस्थाऽपि करोति तापमधिकं रोमावली केन सा॥
हे कामिनी ! तेरे गोल गोल उठे हुए भारी वक्ष, चञ्चल नेत्र, चपल भौंह - लता और रागपूर्ण नवीन पत्तों सदृश सुर्ख होंठ – अगर रसियों के शरीर में वेदना करें तो कर सकते हैं, पर यह समझ में नहीं आता कि, कामदेव के निज हाथों से लिखी सौभाग्य की पंक्ति सी – रोमावली – मध्यस्थ होने पर भी क्यों चित्त को सन्तप्त करती है।
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