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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 35
शार्दूलविक्रीडितपान्थस्त्रीविरहाग्नितीव्रतरतामातन्वती मञ्जरीमाकन्देषु पिकाङ्गनाभिरधुना सोत्कण्ठमालोक्यते ॥ अप्येते नवपाटलीपरिमलप्राग्भारपाटच्चरावान्ति क्लान्तिवितानतानवकृतः श्रीखण्डशैलानिलाः ॥
इस बसन्त में जगह जगह बटोहियों को विरह व्याकुल स्त्रियों की विरहाग्नि में आहुति का काम करने वाली आम की मञ्जरियाँ खिल रही हैं । कोकिला उन्हें बड़ी अभिलाषा या उत्कण्ठा से देख रही है । नए पलाश की फूलों की सुगन्ध को चुरानेवाले और रह की थकन को मिटानेवाली मलय वायु चल रही हैं।
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