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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 69
अनुष्टुभ्तावदेवामृतमयी यावल्लोचनगोचरा । चक्षुःपथादतीता तु विषादप्यतिरिच्यते ॥
स्त्री जब तक आँखों के सामने रहती है, तब तक अमृत सी मालूम होती है परन्तु आँखों की ओट होते ही, विष से भी अधिक दुखदायिनी हो जाती है।
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