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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 78
हरिणीअपसर सखे दूरादस्मात्कटाक्षविषानलात्प्रकृतिकुटिलाद्योषित्सर्पाद्विलासफणाभृतः ॥ इतरफणिना दष्टः शक्यश्चिकित्सितुमौषधे-श्चतुरवनिताभोगिग्रस्तं त्यजन्ति हि मन्त्रिणः ॥
हे मित्र! सहज ही क्रूर, विलास रुपी फण वाले और कटाक्ष रुपी विषाग्नि धारण करने वाले स्त्री-रुपी सर्प से दूर भाग; क्योंकि और सर्पों का काटा हुआ तो मन्त्र और औषधियों से अच्छा हो सकता है; पर चतुर स्त्री रुपी सर्प के डसे हुए को झाड़-फूंक वाले गारुड़ी भी छोड़ भागते हैं।
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