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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 55
मत्तेभकुम्भदलने भुवि सन्ति शूराःकेचित्प्रचण्डमृगराजवधेऽपि दक्षाः ॥ किन्तु ब्रवीमि बलिनां पुरतः प्रसह्यकंदर्पदर्पदलने विरला मनुष्याः ॥
इस पृथ्वी पर मतवाले हाथी का मस्तक विदारनेवाले शूर अनेक हैं, प्रचण्ड मृगराज – सिंह के मारनेवाले भी कितने ही मिल सकते हैं परंतु बलवानों के सामने हम हठ करके कहते हैं कि कामदेव के मद को मर्दन को करने वाले पुरुष विरले ही होंगे।
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