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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 74
शिखरिणीयदेतत्पूर्णेन्दुद्युतिहरमुदाराकृतिवरंमुखाब्जं तन्वङ्ग्याः किल वसति तत्राधरमधु ॥ इदं तत्किम्पाकद्रुमफलमिवातीव विरसं व्यतीतेऽस्मिन् काले विषमिव भविष्यत्यसुखदम् ॥
स्त्री का पूर्णिमा के चन्द्रमा की छवि को हरने वाला कमलमुख, जिसमें अधरामृत रहता है, मन्दार के फल की तरह अज्ञात या यौवनावस्था तक ही अच्छा मालूम होता है; समय बीतने यानि बुढ़ापा आने पर वही कमल मुख अनार के पके और सड़े फल की तरह विष सा हो जाता है।
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