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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 33
द्रुतविलम्बितमधुरयं मधुरैरपि कोकिलाकलरवैर्मलयस्य च वायुभिः ॥ विरहिणः प्रहिणस्ति शरीरिणोविपदि हन्त सुधाऽपि विषायते ॥
ऋतुराज बसन्त, कोकिल के मधुर मधुर शब्दों और मलय पवन से बिरही स्त्री पुरुषों के प्राण नाश करता है। बड़े ही दुख का विषय है कि प्राणियों के लिए विपदकाल में अमृत भी विष हो जाता है।
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