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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 19
स्रग्धरासंसारेऽस्मिन्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानांतत्त्वज्ञानामृताम्भःप्लवलुलितधियां यातु कालः कथञ्चित् ॥ नोचेन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजघनभराभोगसम्भोगिनीनांस्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलोलोद्यतानाम् ॥
इस संसार में जिसकी अन्तिम अवस्था अतीव चञ्चल है, उन्ही बुद्धिमानो का समय अच्छी तरह कटता है, जिनकी बुध्दि तत्वज्ञान रुपी अमृत सरोवर में बारम्बार गोते लगाने से निर्मल हो गयी है अथवा उन्ही का समय अच्छी तरह अतिवाहित होता है, जो नवयौवनाओं के कठोर और स्थूल कूचों एवं सघन जङ्घाओं को सकाम स्पर्श कर कामदेव का उपभोग करते हैं।
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