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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 83
शिखरिणीन गम्यो मन्त्राणां न च भवति भैषज्यविषयोन चापि प्रध्वंसं व्रजति विविधैः शान्तिकशतैः ॥ भ्रमावेशादङ्गे कमपि विदधद्भङ्गमसकृत् स्मरापस्मारोऽयं भ्रमयति दृशं धूर्णयति च ॥
जब कामदेव रुपी अकस्मार – मृगी- रोग का, भ्रम के आवेश से दौरा होता है, तब शरीर में असह्य वेदना होती है, शरीर दुखता है, मन घूमता है और आँखें चक्कर खाती हैं। यह रोग मन्त्र, औषधि, नाना प्रकार के शान्ति कर्म और पूजा पाठ, किसी से भी नाश नहीं होता।
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