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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 29
प्रणयमधुराः प्रेमोद्गाढा रसादलसास्ततोभणितिमधुरा मुग्धप्रायाः प्रकाशितसम्मदाः ॥ प्रकृतिसुभगा विश्रम्भार्हाः स्मरोदयदायिनोरहसि किमपि स्वैरालापा हरन्ति मृगीदृशाम् ॥
मृगनयनी कामिनियों के प्रणय प्रीती से मधुर प्रेम रस से पगे, काम की अधिकता से मन्दे, सुनने में आनन्दप्रद, प्रायः अस्पष्ट और समझ में न आने योग्य, सहज सुन्दर, विश्वासयोग्य और कामोद्दीपन करने वाले वचन, यदि स्वछन्दतापूर्वक एकान्त में कहे जाएं तो निश्चय ही सुनने वाले के मन को हर लेते हैं।
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