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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 22
उपजातिविश्रम्य विश्रम्य वनद्रुमाणां छायासु तन्वी विचचार काचित् । स्तनोत्तरीयेण करोद्धृतेन निवारयन्ती शशिनो मयूखान् ॥
वन के वृक्षों की छाया में बारम्बार विश्राम करती हुई, वह विरहिणी स्त्री, अपने कोमल शरीर की रक्षा के लिए, अपना आँचल हाथ में उठा, उससे चन्द्रमा की किरणों को रोकती हुई घूम रही है।
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