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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 12
शार्दूलविक्रीडितकेशाः संयमिनः श्रुतेरपि परं पारं गते लोचनेअन्तर्वक्त्रमपि स्वभावशुचिभिः कीर्णं द्विजानां गणैः ॥ मुक्तानां सतताधिवासरुचिरौ वक्षोजकुम्भाविमावित्थं तन्वि! वपुः प्रशान्तमपि ते क्षोभं करोत्येव नः ॥
ऐ कृशांगी! हे नाजनी ! तेरे बाल साफ़ सुथरे और सँवरे हुए हैं, तेरी आँखें बड़ी बड़ी और कानो तक हैं, तेरा मुख स्वभाव से ही स्वच्छ और सफ़ेद दन्तपंक्ति से शोभायमान है, तेरे वक्षों पर मोतियों के हार झूल रहे हैं; पर तेरा ऐसा शीतल और शान्तिमय शरीर भी मेरे मन में तो विकार ही उत्पन्न करता है, यह अचम्भे की बात है!
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