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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 37
वसन्ततिलकाअच्छाच्छचन्दनरसार्द्रकरा मृगाक्ष्योधारागृहाणि कुसुमानि च कौमुदी च ॥ मन्दो मरुत्सुमनसः शुचि हर्म्यपृष्ठंग्रीष्मे मदं च मदनं च विवर्धयन्ति ॥
अत्यन्त सफ़ेद चन्दन जिनके हाथो में लग रहा है, ऐसी मृगनयनी सुंदरियाँ, फ़व्वारेदार घर, फूल, चाँदनी, मन्दी हवा और महल की साफ़ छत – ये सब गर्मी के मौसम में, मद और मदन, दोनों ही को बढ़ाते हैं।
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