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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 5
छन्द – शार्दूलविक्रीडित वक्त्रं चन्द्रविडम्बि पङ्कजपरीहासक्षमे लोचने वर्णः स्वर्णमपाकरिष्णुरलिनीजिष्णुः कचानां चयः ॥ वक्षोजाविभकुम्भविभ्रमहरौ गुर्वी नितम्बस्थली वाचां हारि च मार्दवं युवतिषु स्वाभाविकं मण्डनम् ॥
चन्द्रमा स्वरुप मुख, नेत्र ऐसे की कमल को भी शर्म आ जाये, शारीरिक कान्ति ऐसी जो सोने की दमक से को भी फीका कर दे, भौरों के पुञ्ज को जीतनेवाले केश, गजराज के गण्डस्थली की शोभा का अपमान करने वाले वक्ष, विशाल नितम्ब, मनोहर वाणी और कोमलता – ये सब स्त्रियों के स्वाभाविक भूषण हैं।
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