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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 36
आर्यासहकारकुसुमकेसरनिकरभरामोदमूर्च्छितदिगन्ते । मधुरमधुविधुरमधुपे मधौ भवेत्कस्य नोत्कण्ठा ॥
आम की, भौरों की, केसर की गहरी सुगन्ध से दशों दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं, मधुर मकरन्द को पी पी कर भौंरे उन्मत्त हो रहे हैं – ऐसे ऋतुराज वसन्त में किसके मन में कामवासना उदय नहीं होता।
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