शार्दूलविक्रीडितव्यादीर्घेण चलेन वक्रगतिना तेजस्विना भोगिनानीलाब्जद्युतिनाऽहिना वरमहं दष्टो, न तच्चक्षुषा ॥
दष्टे सन्ति चिकित्सका दिशि-दिशि प्रायेण धर्मार्थिनोमुग्धाक्षीक्षणवीक्षितस्य न हि मे वैद्यो न चाप्यौषधम् ॥
बड़े लम्बे, तेज चलने वाले, टेढ़ी चालवाले, भयंकर फनधारी काले से काटा जाना भला; पर अत्यन्त विशाल, चञ्चल, टेढ़ी चालवाले, तेजस्वी और नीलकमल की कान्तिवाले कामिनी के नेत्रों से डसा जाना भला नहीं; क्योंकि सर्प के काटे हुए को बचाने वाले धर्मार्थी मनुष्य सर्वत्र मिलते हैं; पर सुनयना की दृष्टि से काटे हुए की न कोई दवा है न वैद्य।
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