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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 95
मालिनी दिशः वनहरिणीभ्यः स्निग्धवंशच्छवीनां कवलमुपलकोटिच्छिन्नमूलं कुशानाम् ॥ शुकयुवतिकपोलापाण्डु ताम्बूलवल्ली- दलमरूणनखाग्रैः पाटितं वा वधूभ्यः ॥
हे पुरुषों! या तो तुम वन-मृगियों के लिए बांस के दण्डे के समान छविवाली, पत्थर की नोक से कटी हुई मूलवाली, कुश नाम का घास के ग्रास दो अथवा सुन्दरी बहुओं के लिए लाल लाल नाखूनों से तोड़े हुए सुई – तोती के कपोल के समान, जरा जरा पीले रंग के पान दो।
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