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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 98
वैराग्ये सञ्चरत्येको नीतौ भ्रमति चापरः। श्रृङ्गारे रमते कश्चिद् भुवि भेदः परस्परम्।।
कोई वैराग्य को पसंद करता है, कोई नीति में मस्त रहता है और कोई श्रृंगार में मग्न रहता है। इस भूतल पर, मनुष्यों में परस्पर इच्छाओं का भेदाभेद है।
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