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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 4
छन्द – शिखरिणी क्वचित्सुभ्रूभङ्गैः क्वचिदपि च लज्जापरिणतैः क्वचिद् भीतित्रस्तैः क्वचिदपि च लीलाविलसितैः ॥ नवोढानामेर्भिवदनकमलैर्नेत्रचलितैः स्फुरन्नीलाब्जानां प्रकरपरिपूर्णा इव दिशः ॥
कामी पुरुषों को, कभी सुन्दर भौहों से कटाक्ष करने वाली, कभी शर्म से सिर नीचे कर लेने वाली, कभी भय से भीत होने वाली, कभी लीलामय विलास करने वाली, नवीन ब्याही हुई कामिनियों के मुखकमलों की ख़ूबसूरती बढ़ाने वाले नीलकमलों के समान चञ्चल नेत्रों से दसों दिशाएं पूर्ण दिखती हैं।
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