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शृंगार शतकम् • अध्याय 1 • श्लोक 43
शिखरिणीइतो विद्युद्वल्लीविलसितमितः केतकितरोःस्फुरद्गन्धः प्रोद्यज्जलदनिनदस्फूर्जितमितः ॥ इतः केकीक्रिडाकलकलरवः पक्ष्मलदृशांकथं यास्यन्त्येते विरहदिवसाः सम्भृतरसाः ॥
एक ओर चपला का चमचम चमकना, दूसरी ओर केतकी के फूलों की मनोहर सुंगन्ध; एक ओर मेघ की गर्जन और दूसरी ओर मोरों का शोर – ये सब जहाँ एकत्र हैं, वहां सुनयनी विरह-व्याकुला स्त्रियां अपने रास पूर्ण विरह के दिनों को कैसे बिताएंगी?
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